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बाप बेटी की चुदाई – मालिनी अवस्थी की ज़ुबानी-14

पिछला भाग पढ़े:- बाप बेटी की चुदाई – मालिनी अवस्थी की ज़ुबानी-13

आलोक जा चुका था, और रागिनी मानसी को डाक्टर मालिनी के पास छोड़ कर चली गयी थी। डाक्टर मालिनी सोच रही थी कि अपने से इतनी छोटी मानसी से कैसे वो साफ़-साफ़ बात करेगी। मगर बातों-बातों में यहां तो मानसी ने लंड, चूत, चुदाई जैसे शब्द बोल कर मालिनी की समस्या ही हल कर दी।

अब आगे।

उधर मानसी भी शुरू हो गई, “आंटी शुरू करते हैं”।

“ये सब शुरू हुआ जब मैं छोटी थी। मैंने जब से होश संभाला मैं अपनी दादी जी के साथ ही सोती थी। दादी जी के गुजर जाने के बाद मैं मम्मी-पापा के कमरे में उनके साथ ही सोने लगी। उधर मम्मी ने हस्पताल में अपनी शिफ्ट बदलवा कर रात की शिफ्ट करवा ली, जिससे वो दिन भर घर में रहे और मैं अकेली ना रहूं”।

“वक़्त गुजर रहा था। मैं भी बड़ी हो रही थी। मेरे शरीर में बदलाव आ रहे थे। मेरी चूचियां बड़ी हो रही थी। मेरे चूतड़ों पर मांस चढ़ रहा था और चूत के आस-पास बारीक-बारीक भूरे बाल आने लग गए थे”।

“सोती मैं पापा के साथ ही थी। पापा गहरी नींद में सोये होते और मैं पापा के साथ लेटे-लेटे पापा के शरीर के साथ अपनी चूचियां रगड़ती रहती ही। कई बार मैंने तो पापा के लंड को भी छू लिया और पापा को पता भी नहीं चला। आंटी मुझे ये सब करके बड़ा ही अच्छा लगता था”।

“एक रात को जब मैंने अपना हाथ पापा के लंड पर रखा तो मुझे लगा पापा का लंड बाकी दिनों से कुछ ज्यादा ही लम्बा था”।

“पता नहीं मुझे क्या हुआ मैंने पापा का लंड पायजामे के ऊपर से हाथ में ही पकड़ लिया। पापा की नींद तो नहीं खुली, मगर पापा का लंड सख्त होना शुरू हो गया। मैं पापा का लंड हाथ से दबाने लगी। और तभी पापा की नींद खुल गयी”।

“पापा ने मेरा हाथ अपने लंड से हटाने की कोशिश की तो मैंने पापा का हाथ ही झटक दिया”।

“पापा का लंड मेरे हाथ पूरी तरह सख्त हो चुका था। मेरे हाथ में पापा का लंड इतना बड़ा हो चुका था कि लंड के साइज़ से मुझे हैरानी सी हो रही थी। मैं सोच रही थी कि क्या लंड इतना बड़ा भी होता है”?

“तभी पापा ने मेरे हाथ से लंड छुड़ाया और थोड़ा गुस्से से कहा, “मानसी ये क्या कर रही हो? हटाओ अपना हाथ – छोड़ो इसे”।

“पापा के लंड को हाथ में लेकर मुझे अच्छा लग रहा था। मैंने हाथ हटाने के बजाए पापा से कहा, “पापा पकड़ने दो ना, अच्छा लगता है”।

“पापा ने मेरे हाथ से जबरदस्ती लंड छुड़ा कर कहा, “मानसी ये अच्छी बात नहीं बेटा”।

“मैं कुछ नहीं बोली और लंड छोड़ कर चुप-चाप दूसरी तरफ मुंह करके सो गयी। अगली रात जब मैं पापा के साथ सोने के लिए गयी, तो पापा ने मुझसे कहा ,”मानसी अब तुम बड़ी हो गयी हो, मैं फोल्डिंग ला देता हूं उस पर सो जाओ”।

“मैं कुछ नहीं बोली। पापा ने फोल्डिंग बेड बिछा दिया और मैं फोल्डिंग पर सोने लगी। रात को कभी-कभी जब मन करता तो मैं पापा के साथ सोने चले जाती। ऐसे ही चलता रहा।

— मानसी ने बताया मालिनी को कैसे उसने लिया पहला मजा चूत में उंगली करके।

“मुझे माहवारी शुरू हुए भी दो साल हो चुके थे। चूत में भी कभी-कभी अजीब से खुजली होने लगी थी। नहाते वक़्त जब चूत साफ़ करती तो मन करता चूत में उंगली करके चूत को रगड़ती ही जाऊं। चूत में उंगली करते-करते कई बार पापा का लंड हाथ में लेने का मन करता था”।

“एक रात चूत में बड़ी ही अजीब सी खुजली मची। मन किया कि जोर-जोर से चूत रगडूं I मैं उठी और जा कर पापा के साथ लेट गयी”।

“पापा रोज रात को ड्रिंक करके सोते हैं। उस रात भी ड्रिंक की होगी। पापा गहरी नींद में थे। पापा और मैं करवट से लेटे हुए थे। मेरा और पापा का मुंह आमने-सामने था। मैंने अपने पायजामे का नाड़ा खोला और अपनी उंगली अपनी चूत दाने पर रगड़ने लगी”।

“फिर ना जाने क्या हुआ मैंने पापा का हाथ पकड़ा और पकड़ कर अपनी चूत पर धीरे-धीरे रगड़ने लगी”।

“मेरे चूत में जल्दी ही कुछ-कुछ होने लगा। मैंने पापा का हाथ जोर-जोर से ऊपर-नीचे करना शुरू कर दिया”।

“कुछ देर मैं पापा का हाथ अपनी चूत पर रगड़ती रही, मगर पापा सोये ही रहे। जैसे ही मैंने पापा का हाथ कुछ ज्यादा ही जोर से अपनी चूत पर रगड़ना शुरू किया, तो अचानक पापा की नींद खुल गयी और वो बोले, “क्या बात है मानसी, क्या कर रही हो? नींद नहीं आ रही क्या”?

“मैं कुछ नहीं बोली और पापा का हाथ अपनी चूत पर जोर-जोर से रगड़ने लगी। पापा ने हाथ झटके से हटाया तो मैंने पापा का हाथ अपनी चूत पर दबा दिया। इसी कश्मकश के चलते मेरा दूसरा हाथ पापा के लंड पर आ गया”।

“मैंने एक हाथ से पापा का लंड कस कर पकड़ लिया और दूसरे हाथ से अपनी चूत जोर-जोर से रगड़ने लगी। उधर पापा का लंड मोटा होना शुरू हो गया। मुझे मजा सा आ रहा था और मुंह से हल्की-हल्की आवाजें निकल रही थी, जैसे चूत में कुछ कुछ होने लगा था। मेरी चूत में से कुछ लेसदार पानी भी निकल रहा था”।

“फिर पता नहीं क्या हुआ कि अपने आप ही मेरे मुंह से आह आह की आवाजें सी निकलनी शुरू हो गयी। मुझे चूत में कुछ अजीब सा लग रहा था और मुझे मजा भी बहुत आ रहा था”।

“पापा उसके बाद चुप-चाप लेटे रहे और मैं एक हाथ में पापा का लंड पकड़े, पापा का दूसरा हाथ अपने चूत पर रगड़ती रही”।

“तभी मुझे लगा मुझे कुछ हो रहा था। मेरी आखें अपने आप बंद हो गयी। मेरा शरीर अकड़ने लगा। मेरी चूत में अजीब सा कुछ होने लगा”।

“मैंने पापा का हाथ जोर-जोर से अपनी चूत पर ऊपर-नीचे करने लगी। दूसरे हाथ से मैंने पापा का लंड कस कर पकड़ लिया, और तभी मुझे लगा मैं हवा में थी, और मुझे मजा आ गया। जन्नत का मजा। मेरी जिंदगी का पहला मजा – मेरी चूत पानी छोड़ गयी थी। एक ही मिनट में मैं ढीली हो कर लेट गयी और फिर मैंने पापा का लंड भी छोड़ दिया”।

“कुछ देर के बाद मैं उठी और जाके फोल्डिंग पर जा कर सो गयी। अगले दिन जब मैं पापा के कमरे में फोल्डिंग बिछाने लगी तो पापा ने कह दिया, “मानसी, अब तुम छोटी नहीं, दूसरे कमरे में सो जाओ”।

“मैं कुछ नहीं बोली और दूसरे कमरे में सोने चली गयी। इसके बाद ये हुआ कि जब भी कभी चूत में कुछ-कुछ होता, तो मैं उंगली चूत रगड़ कर मजा ले लेती, मगर मुझे हमेशा लगता कि मेरे दूसरे हाथ में पापा का लंड है – सख्त और मोटा लंड”।

“आंटी सच बताऊं, चूत में उंगली करते हुए पता मेरा मन करता था कि काश पापा का लंड मेरे हाथ में होता”।

“वक़्त और गुजर गया। मैं बीस की होने वाली थी कॉलेज जाने लगी और साथ CA की पढ़ाई करने लगी थी”।

“एक रात मैं टॉयलेट जाने के लिए उठी तो देखा पापा के कमरे का दरवाजा खुला था। पापा अपने मोबाइल पर कुछ देख रहे थे। पापा ने पायजामे के ऊपर से ही अपना लंड पकड़ा हुआ था और लंड को कुछ कुछ कर रहे थे। मेरा मन हुआ कि जा कर पापा का लंड अपने हाथ में ले लूं। मैं कमरे में गयी और पापा के पास बैठ गयी”।

“पापा ने लंड छोड़ दिया और बोले, “क्या बात है मानसी। कुछ काम है क्या”?

“मैं कुछ देर ऐसे ही पापा के पास बैठी रही और फिर बोली, “पापा क्या बात है आप सोये नहीं? नींद नहीं आ रही? मम्मी की याद आ रही है क्या? मम्मी भी आपका ध्यान नहीं रखती” I

“मेरे ये कहने पर पापा हड़बड़ा कर बोले, “ऐसी बात तो नहीं मानसी। तुमसे किसने कहा वो मेरा ध्यान नहीं रखती”? मैंने चुप-चाप अपना हाथ पापा के पेट पर रखा और हाथ थोड़ा सा नीचे किया – लंड से सिर्फ दो इंच कि दूरी पर और बोली, “पाप मैं बीस साल कि हूं अब। आप कहो तो मैं आपका ध्यान रख दिया करुं मम्मी की तरह”।

“पापा ने मेरा हाथ अपने पेट से हटाया और बोले, “मानसी ये तुम क्या कह रही हो? रागिनी की तरह तुम मेरा ध्यान रखोगी? क्या मतलब है तुम्हारा”?

“पापा फिर कुछ चुप हुए और बोले, “मानसी ये बात समझ लो, ये कभी नहीं हो सकता, ऐसा कभी सोचना भी मत। तुम्हारी मम्मी हो सकता है मेरा पहले जैसा ध्यान ना रख पाती हो जितना पहले रखती थी। मगर मानसी इससे मुझे कोइ शिकायत नहीं। वक़्त के साथ-साथ हालात और जरूरतें बदलती रहती हैं। जाओ और अपने कमरे में जा कर सो जाओ”।

“मैं उठी और अपने कमरे में चली गयी” I

“इसके बाद मैं रातों को पापा को छुप-छुप कर देखने लगी कि देखूं आज पापा क्या कर रहे हैं I

“कई रातें ऐसी ही गुजर गयी। रातों में मैं उठ कर चुपके-चुपके पापा के कमरे में झांकने लगी ये देखने के लिए कि पापा अपने लंड के साथ कुछ कर तो नहीं रहे”?

“ऐसे ही एक रात को मैं चुपके से पापा को देखने गयी तो जो मैंने देखा, उसे देख कर मेरी चूत में से फर्रर्र से पानी निकला और चूत में कुछ-कुछ होने लगा”।

– जब मानसी ने आलोक को मुट्ठ मारते देखा।

मानसी बता रही थी, “पापा लेटे हुए थे और पापा का लम्बा सारा लंड पापा के हाथ में था और पापा लंड को जोर-जोर आगे-पीछे कर रहे थे। पापा कुछ-कुछ बोल भी रहे थे, जो मुझे सुनाई नहीं दे रहा था। एकाएक पापा का हाथ लंड पर जोर-जोर से आगे-पीछे होने लगा। पापा की आवाज ऊंची हो गयी। पापा आआआह… रागिनी…‌ आअह…‌रागिनी… आआह… रागिनी… मेरी रागिनी बोल रहे थे”।

“पापा जरूर मम्मी का ध्यान कर के मुट्ठ मार रहे थे। मेरा हाथ अपनी चूत पर पहुंच गया और मैं पायजामे के ऊपर से ही अपनी चूत रगड़ने लगी”।

“तभी पापा जोर-जोर से कमर ऊपर-नीचे करने लगे। तभी अचानक पापा जोर से बोले आअह रागिनी। पापा ने जोर से कमर हिलाई और पापा के लंड में से ढेर सारा कुछ सफ़ेद-सफ़ेद सा निकला और पापा के हाथ से होता हुआ पापा के लंड के आस पास फ़ैल गया”।

“मैं वहीं जड़ हो गयी थी और अपने चूत जोर-जोर से रगड़ रही थी। पापा अब निढाल से थके हुए लेटे हुए थे। पापा ने पास ही रखा हुआ तौलिया उठाया, और हाथ और लंड साफ़ कर लिया। तौलिया पास रखने का मतलब था पापा का उस दिन मुट्ठ मारने का पहले से ही मन बना हुआ था। पापा ने पूरी तैयारी करने के बाद ही मुट्ठ मारी थी”।

“लंड साफ़ करके पापा उठने लगे तो मैं भाग कर अपने कमरे में चली गयी। बिस्तर पर लेट कर मैंने पायजामा उतारा और अपनी चूत रगड़ने लगी। मेरी आखों के आगे पापा का लम्बा लंड घूम रहा था”।

“मैंने रगड़-रगड़ कर अपनी चूत का पानी छुड़ा दिया। जैसे ही मेरी चूत का पानी छूटा, मेरी आंखों के आगे पापा के लंड से निकलता सफ़ेद-सफ़ेद पानी घूम गया। मुझे लगा वो सफ़ेद पानी पाप के लंड पर नहीं मेरी चूत पर गिरा था”।

“इसके बाद जब भी मैं अपनी चूत का पानी छुड़ाती, मुझे जब भी मजा आता पापा के लंड से निकलता सफ़ेद पानी भी साथ ही दिखाई देता। ऐसा लगता जैसे मेरी चूत का पानी और पापा के लंड से सफ़ेद पानी इकट्ठे निकल रहे हों। मुझे लगता पापा के लंड का पानी मेरी चूत पर फ़ैल गया है”।

“और इसके दो तीन महीने के बाद ही मेरी चुदाई हो गयी, मेरी जिंदगी की पहली चुदाई। वो चुदाई जिसमें मेरी चूत की सील भी फटी और चूत में से खून भी निकला”।

“इसके बाद मानसी ने मुझे उसकी और प्रभात की चुदाई के बारे में सब कुछ बता दिया”।

“मैंने मानसी से पूछा, “मानसी इस पहली चुदाई से पहले क्या तुम्हारी किसी लड़के के साथ इस तरह की दोस्ती थी”?

मानसी बोली, “नहीं आंटी, मेरी इस तरह की दोस्ती किसी भी लड़के साथ नहीं थी। मेरी तो उस लड़के के साथ भी दोस्ती नहीं थी जिसके साथ मेरी पहली चुदाई हो गयी। असल में आंटी कालेज में मेरे साथ ही एक लड़की पढ़ती है स्नेहा। मेरी अच्छी सहेली भी है, और मेरी ही तरह CA कर रही है। स्नेहा मुझे अपनी सारी बातें बताती है”।

“स्नेहा का एक बॉयफ्रेंड है प्रभात। स्नेहा ने मुझे ये भी बताया था कि प्रभात उसे चोदता था I दरअसल स्नेहा के मम्मी पापा हर महीने दो दिनों के लिए इलाहाबाद जाते हैं संगम में स्नान करने। सुबह-सुबह वाली गाड़ी से चले जाते है, और अगले दिन रात को आते हैं।

“इन्हीं दो दिनों में कभी-कभी उनका चुदाई का प्रोग्राम बन जाता है और प्रभात स्नेहा के घर जा कर ही उसकी चुदाई करता है। ऐसे ही एक दिन जब मैं स्नेहा के घर चली गयी तो देखा स्नेहा के मम्मी पापा इलाहाबाद गए हुए थे। मुझे इस बात का ध्यान ही नहीं था स्नेहा के मम्मी पापा घर पर नहीं हैं”।

“मैं स्नेहा के घर पहुंची तो देखा प्रभात आया हुआ था। मुझे कुछ बुरा सा लगा। मैं तो जानती ही थी कि प्रभात वहां स्नेहा को चोदने आया था। अब उस वक़्त या तो स्नेहा की चुदाई कर चुका था, या फिर करने वाला था”।

“में प्रभात और स्नेहा की मस्ती में बीच का बिच्छू नहीं बनना चाहती थी। मैंने स्नेहा को कहा, “स्नेहा, मैं चलती हूं”।

“स्नेहा बोली, अरे मानसी तू बैठ, प्रभात अभी चला जाएगा”।

“मैं सोफे पर बैठ गयी। प्रभात और स्नेहा आपस में मस्ती कर रहे थे। जिस तरीके से वो दोनों एक-दूसरे को छू रहे थे, मुझसे तो उनकी तरफ देखा भी नहीं जा रहा था। मुझे बड़ी ही शर्म आ रही थी। तभी दोनों ने कुछ इशारा सा किया और स्नेहा मुझसे बोली, “मानसी तुम बैठो, हम अभी आते हैं”। ये बोल कर दोनों उठे और साथ लगते कमरे में चले गए और दरवाजा बंद कर लिया। उनका ऐसा करना मुझे बड़ा अजीब सा लगा”।

“कुछ ही देर में कमरे में से आआह … आआह… उन्ह… उन्ह की अजीब-अजीब आवाजें आने लग गयी। साफ़ लग रहा था वो दोनों चुदाई कर रहे थे। थोड़ी ही देर में आवाजें और ऊंची हो गयी। मेरी अपनी चूत में कुछ-कुछ होने लगा। मुझे लगा मेरी चूत गीली-गीली सी हो रही थी”।

“मैंने सलवार के अंदर हाथ डाल कर चूत में उंगली करनी शुरू कर दी, और मजा लेने लगी। कुछ देर कमरे में से वैसी ही आवाजें आती रही। फिर एक-दम से आवाजें आनी बंद हो गयी। लग रहा उनकी चुदाई खत्म हो चुकी थी”।

“कुछ देर बाद दरवाजा खुला और दोनों कमरे में आ गए। मेरा हाथ तब भी सलवार के अंदर ही था”।

“स्नेहा ने ये देखा तो बोली, मानसी ये क्या कर रही हो? चूत में उंगली कर रखी है क्या? चुदाई का मन हो रहा है क्या”?

“मैं चुप रही मगर मैंने अपना हाथ अपनी सलवार में से नहीं निकाला। सच पूछो तो आंटी चुदाई का मन तो मेरा हो ही रहा था”।

“स्नेहा मेरे पास आ गयी और बोली, “मानसी बोलो, क्या चुदाई करवानी है”?

“मैं जब फिर भी चुप रही तो स्नेहा ने प्रभात को कहा, “प्रभात मानसी को ले जाओ। मानसी को भी चुदाई का मजा लेना है”।

“प्रभात का मेरे साथ ऐसा कोइ चक्कर ही नहीं था। हमने कभी एक-दूसरे को इस तरह से देखा ही नहीं था। स्नेहा के कहने पर भी प्रभात अपनी जगह से नहीं हिला”।

“फिर स्नेहा ने प्रभात का हाथ पकड़ा और मेरे पास खींच कर ले आयी और बोली, “प्रभात देख नहीं रहे मानसी की चूत कुछ मांग रही है, ले जाओ और चुदाई करके इसकी भी चूत का पानी निकालो”।

“इस पर प्रभात ने मुझे उठाया, स्नेहा के सामने ही मेरी चूचियां जोर से दबायी, और होठों पर एक किस किया, और मुझे उस दुसरे कमरे में ले जाने लगा”।

“मेरे पैर मेरा साथ नहीं दे रही थे, और मैं प्रभात के साथ खिचती चली जा रही थी। स्नेहा पीछे से बोली, “आराम से करना प्रभात, मानसी कुंवारी है – मानसी की चूत की सील अभी नहीं फटी।

“प्रभात मुझे कमरे में ले गया, और मेरे कपड़े उतार कर खुद भी नंगा हो गया। प्रभात का लंड खड़ा था। प्रभात ने अपना लंड मेरे हाथ में पकड़ा दिया। मुझे प्रभात का खड़ा लंड पकड़ कर बड़ा ही अच्छा लग रहा था”।

“कुछ देर हम ऐसे खड़े रहे। प्रभात मेरी चूचियां दबाता रहा और मैं प्रभात के लंड के साथ कुछ-कुछ करती रही”।

“प्रभात ने मुझे बेड पर बिठाया, और लंड मेरे मुंह के सामने कर दिया। जब मैंने लंड को कुछ नहीं किया तो प्रभात ने अपना लंड मेरे होठों पर फेरना शुरू कर दिया और बोला, “मुंह में लो मानसी चूसो इसे। प्रभात का लंड मुंह में लेने के ख्याल से ही मुझे तो उल्टी होने को हो गई। मैंने प्रभात के लंड को पकड़ जरूर लिया, मगर मुंह में नहीं लिया”।

प्रभात ने कहा दुबारा कहा, “मुंह में लो मानसी चूसो इसे, बड़ा मजा आएगा”।

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